अबे कस्बाई मन!

अरे ए तमाशाई मन!अब तो बदल जा.कंधे से 'प्राविंशियल'बैताल को पटक और विक्रम 'द कास्मोपालिटन' हो जा!

Name: भारत भूषण तिवारी
Location: Jersey City, New Jersey, United States

शरद जोशी के शब्दों में 'आलस्य और अकर्मण्यता का मधुर सम्मिश्रण कलात्मक अनुपात में'

Tuesday, October 17, 2006

मैनहटन-२

सितम्बर की उमस भरी रात में
'मैनहटन'
परेशान सा लग रहा है!
मैं जब भी रात में
अपने कमरे की खिडकी से
बाहर देखता हूँ
तो 'मैनहटन' को
जान-बूझकर
नज़रअंदाज़ करता हूँ.
हाँ, कभी-कभी कनखियों से
निहार लिया करता हूँ.
अगर 'हडसन' के साथ
बातें करने में मग्न हुआ तो
वह भी मेरी तरफ़
ध्यान नहीं देता.
मगर आज
दिन भर सूरज की किरणों का ताप झेलकर
थकी-हारी
'हडसन'
'मैनहटन'
की ओर
पीठ करके
लेटी हुई है
उस मज़दूर औरत की तरह
जो
दिन भर कडी धूप में
सिर पर ईंटें ढोने के बाद
कमर सीधी करते ही
ऊँघने लगती है.
शायद इसीलिए
'मैनहटन'
बौखलाया सा लग रहा है.
मैं शायद बताना भूल गया,
पिछले कुछ महीनों में
इतनी तो जान-पहचान
हो गई है कि
'मैनहटन'अब मुझे
'इन्टीमिडेट'
नहीं करता.
इसी वजह से अब
ज़्यादातर
खुली रहने लगी है
मेरे बेडरूम की खिडकी.
क्या पता आ ही बैठे
वह
कुहनी टेककर
मेरी खिडकी पर.
बातें तो बहुत सारी
करनी है
'मैनहटन'से,
पूछने हैं कई सवाल
जानना है
कईयों का हाल.
शायद बता ही दे वो
उस बुढिया की कहानी
जिसका
'मेडन लेन' की दुकानों
की सीढियों पर रैन-बसेरा है.
शायद पता हो उसे
'वर्ल्ड ट्रेड सेंटर'के सामने
अखबार की प्रतियाँ बाँटने वाली
अश्वेत महिला की आँखों से टपकती
लाचारी का कारण.
क्या पता सुना ही दे
कॉफ़ी-बेगल का ठेला लगाने वाले
'मार्क' के युवा बेटे के
सपनों की दास्तान.
'सी-पोर्ट' पर बैठने वाले
बूढे भिखारी की
मैली-कुचैली पोटली
का राज़ ही खोल दे शायद.
या कह उठे संघर्ष-गाथा
अपनी साइकिलों के कैरियर पर
पिज़ा-बर्गर
और न जाने क्या-क्या
'डिलीवर' करते
'हिस्पैनिक' पुरुषों की.
'डव-जोन्स','नॅस्डॅक' और 'एस एण्ड पी ५००' के
उतार-चढाव,
९-११ के हमलों में मारे गए
लोगों कि फ़ेहरिस्त,
संयुक्त राष्ट्र महासभा की
बहसें और प्रस्ताव,
'टाइम्स स्क्वेयर' के
चौंधिया देने वाले होर्डिंग
'ब्रूकलिन-ब्रिज' के
सवा-सौ सालों के इतिहास
और
'सेंट्रल पार्क' के क्षेत्रफल
के अलावा
इन सारी बातों की
जानकारी
भी रखता तो होगा
'मैनहटन'!

5 Comments:

Blogger priyankar said...

मैनहटन के सांस्कृतिक-राजनैतिक और आर्थिक परिवेश के तटस्थ पर्यवेक्षण से उपजे भावों को सही-सही प्रतिबिम्बित करती बेहतरीन कविता

3:36 AM  
Blogger Pratyaksha said...

बहुत ही उम्दा कविता !

5:31 AM  
Blogger अनूप भार्गव said...

सुन्दर कविता है ...

11:30 PM  
Blogger अभिनव said...

वाह भाई,
यह जानकर अच्छा लगा कि मैनहैटन से जान पहचान हो गई है।
आपकी कविता आज दिन में दो लोगों को पढ़ कर सुनाई तथा इस बहाने खुद भी पढ़ी शायद पाँचवी बार।
अगली कड़ी की प्रतीक्षा है, कृपया शीघ्र प्रेशित करें।

11:17 PM  
Blogger Nishikant Tiwari said...

आ गया पटाखा हिन्दी का
अब देख धमाका हिन्दी का
दुनिया में कहीं भी रहनेवाला
खुद को भारतीय कहने वाला
ये हिन्दी है अपनी भाषा
जान है अपनी ना कोई तमाशा
जाओ जहाँ भी साथ ले जाओ
है यही गुजारिश है यही आशा ।
NishikantWorld

4:40 AM  

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