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डॉ. मार्टिन लूथर किंग का पुनर्जन्म

ग्लेन बेक और सेरा पेलिन ओबामा के विरोध में उभर रहे घोर दक्षिणपंथी और नस्लवादी आन्दोलन 'टी पार्टी मूवमेंट' का पब्लिक फेस हैं. सेरा पेलिन, जो पिछले चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी की उप-राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार थीं, कंज़र्वेटिव अमेरिकी मीडिया की चहेती हैं . जनाब ग्लेन बेक राजनीतिक विश्लेषक हैं और वे भी कंज़र्वेटिव मीडिया की आँखों के तारे हैं.. बेक साहब फ़ॉक्स न्यूज़ चैनल पर अपना एक कार्यक्रम चलाते हैं और 'अमेरिकनिज्म' के नाम पर हर प्रगतिशील विचार/व्यक्ति को गालियाँ देते रहते हैं. इन दोनों महान हस्तियों की अगुवाई में शनिवार, 28 अगस्त को वाशिंगटन डीसी के लिंकन मेमोरियल एक रैली आयोजित की गई थी जिसमें हजारों लोग शामिल हुए. कहने को अराजनीतिक इस रैली को नाम दिया गया था 'रेस्टोरिंग औनर'; और ज़ाहिर है कि औनर की इस पुनरुत्थानवादी थीम के केंद्र में धार्मिक राष्ट्रवाद है. पर सबसे मज़े की बात यह है कि यह रैली उसी दिन (28 अगस्त) और उसी जगह (लिंकन मेमोरियल) आयोजित की गई जहाँ 1963 में डॉ मार्टिन लूथर किंग ने अपना प्रसिद्द ' आइ हैव अ ड्रीम ' भाषण दिया था. अब तक मुझे लगता...

लिट्ल मोर आडॅसिटी

बिल माअर अमेरिका के शेखर सुमन हैं. या ऐसे भी कहा जा सकता है कि शेखर सुमन भारत के बिल माअर हैं. माअर का टॉक शो 'पॉलिटिकली इनकरेक्ट' नब्बे के दशक में खासा लोकप्रिय रहा है. अमेरिकी समाज से धार्मिक कट्टरता दूर करने, वैज्ञानिक और तार्किक सोच को बढ़ावा देने के लिए शुरू किये गए दि रीज़न प्रोजेक्ट से भी वे जुड़े हैं. गड्ड-मड्ड राजनैतिक विचारों के बावजूद बिल माअर की व्यंग्य-दृष्टि काबिल-ए-तारीफ़ है. आजकल वे एचबीओ पर एक कार्यक्रम 'रियल टाइम विद बिल माअर' कर रहे हैं. इसके ताज़ातरीन प्रसारण में उन्होंने राष्ट्रपति ओबामा को निशाना बनाया. अमेरिकन टेलिविज़न पर ओबामा के छाये रहने की बात से मुझे उस दौर की याद आ गयी जब प्रधानमंत्री राजीव गाँधी दूरदर्शन पर छाये रहते थे. वास्तविक मुद्दों को सुलझाने में ओबामा के ढुलमुल रवैये को लेकर माअर ने उनकी ज़बरदस्त खिंचाई की है और उन्हें थोड़ा 'बुशपन' लाने की सलाह भी दी है. और हाँ, संस्थागत धर्म के कटु आलोचक माअर ने पिछले साल एक डॉक्युमेंटरी रिलिग्युलस भी बनाई थी जो काफी चर्चित हुई .

गीत और संघर्ष के 90 साल

आज पीट सीगर 90 साल के 'जवान' हो गए. फ़रवरी में उनके ग्रैमी अवार्ड जीतने पर में यह पोस्ट किया था. आज फिर उनको सलाम करते हुए सुनते हैं 'ग्वान्तानामेरा'. वैसे तो इस स्पैनिश गीत को कई अमेरिकी और लातिन अमेरिकी कलाकारों ने गाया है मगर मुझे सीगर का संस्करण सबसे ज्यादा पसंद है. शुरुआत में सीगर इस गीत के रचयिता होसे मार्ती के बारे में बताते हैं. और अपनी बेमिसाल 'कन्वर्सेशनल' शैली में इस गीत को गाते हुए इसके अंग्रेजी भावानुवाद से भी श्रोताओं को परिचित कराते हैं.पीपुल्स वीकली वर्ल्ड में सीगर के सम्मान में लिखा गया जॉन पिएतारो का आलेख यहाँ पढ़ा जा सकता है.

अब्राहम लिंकन के बहाने अशोकन फेयरवेल

अब्राहम लिंकन की गणना अमेरिका के महानतम राष्ट्रपतियों में होती है. गृह युद्ध के उथल-पुथल भरे दौर में राष्ट्रपति रहे लिंकन ने अलगाववादी दक्षिणी राज्यों के समूह ( कंफेडरसी ) के खिलाफ संघ को विजय दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाई. इसी अनुषंग में उन्हें अमेरिका में दास प्रथा को समाप्त करने के लिए भी याद किया जाता है. गत फ़रवरी में लिंकन की द्विशती मनायी गयी. अमेरिका के प्रचलित इतिहास में गृह युद्ध भावनाओं को उभारने वाला अध्याय है. प्रचलित इतिहास इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि एक वह इतिहास भी है जिसे जन-इतिहास या पीपुल्स हिस्ट्री कहा जाता है. महान अश्वेत नेता फ्रेडरिक डगलस ने लिंकन के बारे में कहा था कि "विशुद्ध दासता-विरोधी दृष्टिकोण से देखा जाए तो लिंकन मंद, रूखे, सुस्त और उदासीन प्रतीत होते हैं. मगर देश की जन-भावना के हिसाब से नापा जाए- वह भावना जिस पर ध्यान देने के लिए एक राजनीतिज्ञ के तौर वे बाध्य थे- तो वे तेज़, उत्साही, रैडिकल और दृढ़संकल्प थे." केन बर्न्स ने गृह युद्ध पर बड़ी शानदार डॉक्युमेंटरी बनायी है. पीबीएस चैनल पर 1990 में हुआ इसका प्रसारण चार करोड़ लोगों ने देखा और आज भ...

जॉन होप फ्रैंकलिन का निधन

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गत 25 मार्च को अमरीकी इतिहासकार जॉन होप फ्रैंकलिन का 94 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. अमेरिकी इतिहास में अश्वेतों को उनका उचित स्थान दिलाने में फ्रैंकलिन का महती योगदान है. नस्लवादी पूर्वाग्रह से ग्रस्त अमेरिका के दक्षिणी राज्य ओक्लाहोमा में पैदा हुए फ्रैंकलिन ने अश्वेतों के प्रति होने वाले भेद-भाव और दुर्व्यवहार को स्वयं अनुभव किया था. ऐसा ही एक कटु अनुभव उस समय का है जब बचपन में उन्होंने एक नेत्रहीन महिला को सड़क पार करने में मदद करने की कोशिश की. जब उन्होंने यह बताया कि वे अश्वेत हैं तो उस महिला ने घृणा से उनका हाथ झटक दिया. अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में वह जिम क्रो कानूनों का दौर था.  जिम क्रो कानूनों के अनुसार सरकारी स्कूलों, सार्वजनिक शौचालयों, बसों, ट्रेनों, रेस्तराँ और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर श्वेत और अश्वेत लोगों के लिए अलग व्यवस्था थी. ये कानून कहने को तो अश्वेतों को 'पृथक मगर बराबर' (सेपरेट बट ईक्वल) दर्जा देते थे मगर मूलतः ये नस्लवादी मानसिकता का प्रतीक थे.  'ब्राउन विरुद्ध बोर्ड ऑफ़ एजूकेशन' केस को बीसवीं सदी के अमेरिकी इतिहास में मील का पत्थर माना जाता ह...

सेसर शावेज़ की याद में

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  31 मार्च सेसर शावेज़ का जन्मदिन है. मेक्सिकन मूल के इस अमेरिकी मजदूर नेता  ने उचित मजदूरी  और काम की  परिस्थितियों में सुधार के लिए खेतिहर श्रमिकों को संगठित किया.महात्मा गाँधी से गहरे प्रभावित शावेज़ ने 1962 में नेशनल फार्म वर्कर्स असोसिएशन की स्थापना की जिसका नाम बाद में बदल कर यूनाईटेड फार्म वर्कर्स कर दिया गया. आज यूनाईटेड फार्म वर्कर्स अमेरिका में खेतिहर मजदूरों की अग्रणी यूनियन है. शावेज़ की अगुवाई में यूनाईटेड फार्म वर्कर्स ने खेतिहर मजदूरों की स्थिति सुधारने के लिए कई आन्दोलन चलाये. इस महान नेता के सम्मान में उनके जन्म-दिन पर अमरीका के आठ राज्यों में अवकाश होता है. यूनाईटेड फार्म वर्कर्स ने 31 मार्च को राष्ट्रीय अवकाश घोषित करने की मांग की है.  इस मांग के समर्थन के लिए अमेरिकी जनता के बीच हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है. http://www.ufwaction.org/campaign/chavezholiday09

वो जो नहीं है किसी जैसा

फ़रोग फरोखज़ाद की कविताएँ शिरीष जी ने पिछले हफ़्ते अनुनाद पर पोस्ट की थीं. आज शहीदों को याद करते हुए उनकी एक और कविता (मूल फ़ारसी के माइकल सी. हिलमन द्वारा किये गए अंग्रेजी अनुवाद से अनूदित) प्रस्तुत है. वो जो नहीं है किसी जैसा मैंने एक ख़्वाब देखा कि कोई आ रहा है. मैंने एक लाल सितारे को ख़्वाब में देखा, और मेरी पलकें झपकने लगती हैं मेरे जूते तड़कने लगते हैं अगर मैं झूठ बोल रही हूँ तो अन्धी हो जाऊँ. मैंने तब उस लाल सितारे का ख़्वाब देखा जब मैं नींद में नहीं थी, कोई आ रहा है, कोई आ रहा है, कोई बेहतर. कोई आ रहा है, कोई आ रहा है, वो जो अपने दिल में हम जैसा है, अपनी साँसों में हम जैसा है, अपनी आवाज़ में हम जैसा है, वो जो आ रहा है जिसे रोका नहीं जा सकता हथकड़ियाँ बाँध कर जेल में नहीं फेंका जा सकता वो जो पैदा हो चूका है याह्या के पुराने कपडों के नीचे, और दिन ब दिन होता जाता है बड़ा, और बड़ा, वो जो बारिश से, वो जो बून्दों के टपकने की आवाज़ से , वो जो फूलों के डालियों की फुसफुसाहट में, जो आसमान से आ रहा है आतिशबाज़ी की रात मैदान-ए-तूपखाने में दस्तर-ख्वान बिछाने रोटियों के हिस्से करने पेप्सी बाँटने बा...